Friday, 10 August 2018

रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri

रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri

रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri: नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग पर आज हम आपके सामने हरदेव बाहरी की सबसे महत्वपूर्ण खंड जो कि है रस अलंकार और छंद दे रहे हैं, चलिए देखते हैं हम लोग,एक-एक करके सब के बारे में, रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी  हम नीचे जाकर डाउनलोड भी कर सकते हैं. हरदेव बाहरी सामान्य हिंदी pdf download
रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri



हरदेव बाहरी जी ने रस अलंकार छंद को सबसे विशेष रूप से और बेहतर रूप से लिखा है इससे अच्छी लिखावट और किसी पुस्तक में हो ही नहीं सकती रस अलंकार छंद का सबसे बेहतरीन कलेक्शन अगर कहीं है तो वह है हरदेव बाहरी में आप किसी भी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं हिंदी वहां पर एक महत्वपूर्ण विषय भी जाता है अगर हिंदी एक विषय के रूप में पूछा जा रहा है और रस अलंकार छंद सिलेबस के रूप में मेंशन है तो आपको इस PDF को डाउनलोड करके अवश्य पढ़ना चाहिए.

रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri

General Hindi by Hardev Bahri Shabd Arth Prayog all other part

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रस


कविता को पढ़ने और नाटक देखने से पाठक और श्रोता को जोश और साधना और अनिर्वचनीय आनंद अनुभूति होती है वही रस है रस पूर्ण वाक्य ही काव्य है. साहित्य दर्पण में काव्य की व्याख्या करते हुए आचार्य विश्वनाथ लिखते हैं- “वाक्यं रसात्मकं काव्यं” अर्थात रसात्मक वाक्य को खाक कहते हैं. रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है.


रस की निष्पत्ति के संबंध में भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में लिखा है- विभावनुभावव्यभिचारी संयोगरसनिष्पत्ति


प्रभात विभव अनुभव और व्यभिचारी संचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है. इस आधार पर रस की निष्पत्ति के निम्नलिखित तत्व हैं-


स्थाई भाव


विभाव


अनुभाव


संचारी भाव


1.स्थाई भाव- मानव ह्रदय में कोई स्थाई रूप से विद्यमान रहते हैं इन्हें स्थाई भाव कहते हैं स्थाई भाव की परिपक्व अवस्था ही रस है यह 9 है अतः रस भी ना माने गए हैं.


स्थाई भाव- रस


1. रति- श्रृंगार


2. हास- हास्य


3. शोक- करुण


4. उत्साह- वीर


5. क्रोध- रौद्र


6. भय- भयानक


7. जुगुप्सा( घृणा)- वीभत्स


8. विश्व में- अद्भुत


9. निर्वेद( वैराग्य)- शांत





2.विभाव- रसों को उदित और उद्दीप्त करने वाली सामग्री विभव कहलाती है विभाव के भेद तीन हैं-


आलंबन- जिस वस्तु या व्यक्ति के कारण स्थाई भाव जागृत होता है उसे आलंबन विभाव कहते हैं यश नायक-नायिका प्राकृत आधी


आश्रय- जिसके हृदय में भाव उत्पन्न होता है उसे आश्रय कहते हैं.


उद्दीपन- स्थाई भाव को द्वितीय तीव्र करने वाले कारण उद्दीपन विभाव कहलाते हैं. जैसे नायिका का रूप सौंदर्य आदि. प्रत्येक रस के उद्दीपन विभाव अलग-अलग होते हैं





3. अनुभाव- मनोगत भाव को व्यक्त करने वाली शारीरिक और मानसिक चेष्टाएं अनुभाव हैं. अनुभव भाव के बाद उत्पन्न होती हैं, इसलिए इन्हें अनु + भाव =भाव का अनुसरण करने वाला कहते हैं.


अनुभाव मुख्यता दो प्रकार के हैं-


कायिक और सात्विक


कायिक अनुभाव- कायिक अनुभाव शरीर की चेष्टाओं को कहते हैं जैसे कटाक्षपात, हाथ से इशारे करना, आदि. कायिक अनुभाव जानबूझकर प्रयास पूर्वक किए जाते हैं.


सात्विक अनुभाव- जो शारीरिक चेष्टाएं स्वाभाविक रूप से सदा उत्पन्न हो जाती हैं उन्हें 7 भाव कहते हैं यह गणना में 8- रोमांच, कंप, स्वेद, स्वरभंग, अश्रु, @@ (चेहरे का रंग उड़ना), स्तंभ( शरीर की चेष्टा का रुक जाना), प्रलय( चेतना शून्य होना)





4. संचारी भाव- जो भी मन में केवल अल्पकाल तक संचरण करने वाली जाते हुए संचारी भाव कहलाते हैं, इन्हीं का दूसरा नाम व्यभिचार भाव हैं, यह स्थाई भाव को पुष्ट करके क्षण भर में गायब हो जाते हैं इनकी संख्या 33 है.


निर्वेद आवेग दैन्य श्रम मद जड़ता उग्रता मोह शंका चिंता ग्लानि विशाद व्याधि आलस्य हर्ष असूया धृति मती चप्पल ल लज्जा निद्रा स्वप्न उन्माद स्मृति त्रास मरण आदि


रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri



छंद


मात्रा और वह आज के विचारों से होने वाली वाक्य रचना को छंद कहते हैं. जैसे व्याकरण द्वारा गद्य का अनुशासन होता है वैसे छंद द्वारा पद्य का अनुशासन होता है. छंद का दूसरा नाम पिंगल भी है इसका कारण यह है कि छंदशास्त्र में इस के स्थापक पिंगल नाम के ऋषि थे. पिंगला 4 के छंद सूत्र में चंद्र का वर्ण होने के कारण इसे छंदशास्त्र का आदि ग्रंथ माना जाता है इसी कारण इस आधार पर छंद शास्त्र को “पिंगल शास्त्र” भी कहते हैं.


छंद की परिभाषा मित्रस्य कर सकते हैं कि तुक मात्रा लय विराम वर्ण आदि के नियमों में आबद्ध पंक्तियां छंद कहलाती है.


छंद के अंग-


वर्ण, मात्रा, यति, गति, पाद्य चरण, तुक, गण





वर्ण-वर्ण के दो प्रकार होते हैं-@@ र्और दीर्घ वर्ण


मात्रा- माता के अल्सर की होती है लघु मात्रा का चिन्ह(|) तथा दीर्घ मात्रा का चिन्ह(), मात्रिक छंद में मात्रा किन करी छंदों की पहचान की जाती है.


यति- चंद्र को पढ़ते समय प्रत्येक चरण के अंत में पहनना पड़ता है इस गाने को यदि कहते हैं


गति- कविता के करणमधु प्रवाह को गति कहते हैं प्रत्येक शब्द की अपनी लय होती है.


पाद् या चरण- प्रत्येक छंद में कम से कम चार चरण होते हैं जिनमें प्रत्येक पंक्ति अर्थात छंद के चतुर्थांश को चरण कहते हैं, चरण को पद या पाद् भी कहते हैं.


तुक- चरण के अंत में आने वाले समान वर्णों को तुक कहते हैं,


गण-तीन तीन वर्णों के समूह को गण कहा जाता है





छंदों के भेद-


1. मात्रिक 2. वर्णिक


मात्रिक- जिनकी पहचान केवल मात्राओं के आधार पर की जाती है जैसे दोहा चौपाई सोरठा आदि


2. वर्णिक छंद- जिन शब्दों के पहचान के लिए वर्णों के क्रम का विचार किया जाता है तथा उसी के आधार पर वर्णों की गणना की जाती है उन्हें वर्णिक छंद कहते हैं


मात्रिक छंदों के भेद


दोहा- इसके प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएं और द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएं होती हैं या अर्ध सम मात्रिक छंद


सोरठा- या अर्ध सम मात्रिक छंद है इसके पहले एवं तीसरे चरण में 11-11 मात्राएं तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं या दोहे का उल्टा होता है,


चौपाई- या एक सम मात्रिक छंद इसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएं होती हैं तथा अंत में दो गुरु शुभ माने जाते हैं


रोला- इसमें चार चरण होते हैं प्रत्येक चरण में 11-13 के विराम से 24 मात्राएं होती हैं


कुंडलियां- दोहा और रोला छंद को मिलाने से कुंडलियां छंद बनता है प्रथम दो पंक्तियां दोहा छंद तथा अंतिम चार पंक्तियां रोला छंद की होती, इसमें चौथा चरण पांचवें चरण में यथावत आता है इस प्रकार इस की प्रत्येक पंक्ति 24-24 मात्राएं होती हैं


हरिगीतिका- हरिगीतिका के प्रत्येक चरण में 16/12 के विराम से 28 मात्राएं होती हैं या एक सम मात्रिक छंद है


उल्लाला- इसके विषम चरण में 15 और सम में 13 मात्राएं होती इस प्रकार यह 28 मात्राओं का छंद


गीतिका छंद- प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं 14,12 पर यति और अंत में लघु गुरु का विद्वान


बरवे- इसके पहले तो पति से चरण में 12-12 और दूसरे और चौथे चरण में 7-7मात्राएं होती हैं


ऐसे ही छंदों के विभिन्न भेद हैं विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए हरदेव बाहरी की रस छंद अलंकार के खंड को पढ़ें


रस अलंकार छंद हरदेव बाहरी | Ras Alankar Chhand Hardev Bahri



अलंकार अलंकार का शाब्दिक अर्थ सजावट सिंगार आभूषण आदि, साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग काव्य सौंदर्य के लिए होता है.


जैसे किसके आभूषण को पहनने से व्यक्ति का शारीरिक सौंदर्य और आकर्षण बढ़ जाता है उसी प्रकार काम में अलंकारों के प्रयोग से उस के संदर्भ में वृद्धि होती है, दूसरे शब्दों में का सुबह बढ़ाने वाले धर्म अलंकार कहलाते हैं, इससे कम से कम यह निष्कर्ष निकलता है कि अलंकार काव्य को रमणीयता प्रदान करते हैं. अलंकार के दो मुख्य भेद हैं- शब्दालंकार और अर्थालंकार





जहां शब्द के कारण कविता में सौंदर्य चमत्कार आ जाता है वहां शब्दालंकार और जहां अर्थ के कारण रमणीयता आ जाती है वहां अर्थालंकार होता है.


अलंकार अलंकार का शाब्दिक अर्थ सजावट सिंगार आभूषण आदि, साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग काव्य सौंदर्य के लिए होता है.

जैसे किसके आभूषण को पहनने से व्यक्ति का शारीरिक सौंदर्य और आकर्षण बढ़ जाता है उसी प्रकार काम में अलंकारों के प्रयोग से उस के संदर्भ में वृद्धि होती है, दूसरे शब्दों में का सुबह बढ़ाने वाले धर्म अलंकार कहलाते हैं, इससे कम से कम यह निष्कर्ष निकलता है कि अलंकार काव्य को रमणीयता प्रदान करते हैं. अलंकार के दो मुख्य भेद हैं- शब्दालंकार और अर्थालंकार

जहां शब्द के कारण कविता में सौंदर्य चमत्कार आ जाता है वहां शब्दालंकार और जहां अर्थ के कारण रमणीयता आ जाती है वहां अर्थालंकार होता है.

शब्दालंकार

शब्दालंकार 7 प्रकार के होते हैं इनमें अनुप्रास यमक श्लेष तथा वक्रोक्ति मुख्य




अनुप्रास

जहां किसी पंक्ति के शब्दों में एक ही वर्ड एक से अधिक बार आता है वहां अनुप्रास होता है

चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रहीं हैं जल थल में

यहां च वर्ण की आवृत्ति हुई है

अनुप्रास के पांच भेद होते हैं

छेकानुप्रास वृत्यानुप्रास लोटा अनुप्रास श्रुत्यानुप्रास अंत्यानुप्रास

छेकानुप्रास यहां पर केवल दोबारा आए

यमक अलंकार

जहां कोई शब्द एक से अधिक बार आवे और प्रत्येक स्थान पर भिन्न भिन्न अर्थ दे वहां यमक अलंकार होता है यमक का अर्थ ही होता है दो

कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय या खाए बौराय जग वा पाए बौराय

श्लेष अलंकार

यहां किसी शब्द से एक से अधिक अर्थ निकले वहां सलेश अलंकार होता है

इसका अर्थ होता है चिपका हुआ सीलिस्ट शब्द में एक से अधिक अर्थ चिपके रहते हैं

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून

वक्रोक्ति अलंकार

वक्रोक्ति अलंकार जहां जब किसी एक आशय से कहीं जाए और सुनने वाला उससे भिन्न दूसरा अर्थ लगा दे वह वक्रोक्ति अलंकार होता है

इसके दो प्रकार हैं स्लिप वक्रोक्ति काकु वक्रोक्ति

को तुम हो? इसाई कहां?

घनश्याम है तो कितहूं बरसों|

अर्था अलंकार

शब्दालंकार में किसी शब्द को हटाकर यदि उसका पर्याय रख दिया जाए तो उस शब्द का संदेश नष्ट हो जाता है अतः ऐसे अलंकार की खोज हुई जिसका चमत्कार शब्द पर निर्भर ना करें वरन उसके ना रहने पर भी बना रहे आशय यह है कि रमणीयता शब्दों में नहीं अर्थ में निहित रहे ऐसे अर्थ अलंकारों की कोई संख्या निहित नहीं की जा सकती फिर भी उसमें जो प्रमुख हैं उनकी चर्चा की जा रही है

उपमा

जहां एक वस्तु की समानता दूसरे वस्तु से की जाए वहां उपमा अलंकार होता है

उप का अर्थ होता है समीप मां का अर्थ होता है मापना तुलना

जैसे राधा रति के समान सुंदरी है

रूपक

जहां उपमेय को उपमान  के रूप में दिखाया जाए वहां रूपक अलंकार होता है

जैसे मुखचंद्र आशय मुख चंद्रमा के सामान

रूप के भी तीन भेद हैं निरंग Sang परमपरित

प्रतीप अलंकार

जहां उपमान कोर्ट में केस सामान कहा जाए अथवा उपमेय उपमान से श्रेष्ट बताया जाए

जैसे

संध्या होली परमप्रिय की कांति सी है दिखाती

उत्प्रेक्षा अलंकार

यहां उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है वहां उत्प्रेक्षा अलंकार हो जाता है

मानो मन जान निश्चय आदि शब्दों का इस्तेमाल होता है

चमचमाता चंचल नयन बिच घूंघट पट दीन

मानव सुरसरिता विमल जल उजरत युग मीन

व्यतिरेक अलंकार

जहां उपमेय उपमान से श्रेष्ट बताया जाए और उसके कारण भी दिए जाएं वहां व्यतिरेक अलंकार होता है

साधु ऊंचे सेंड सम किंतु प्रकृति सुकुमार




असंगति अलंकार

जहां कारण कहीं हो उसका कार्य कहीं हो वहां असंगति अलंकार होता है

निदर्शना अलंकार

जहां उपमेय और उपमान से दो वाक्यों में अर्थ की भिन्नता होते हुए भी एक दूसरे का संबंध किस प्रकार स्थापित किया जाए कि उनमें समानता प्रतीत होने लगे

विभावना अलंकार

जहां बिना कारण के ही कार्य हो जाए वहां विभावना अलंकार होता है

अतिशयोक्ति अलंकार

जहां किसी वस्तु को बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया जाए अथवा सीमा के बाहर की बात कही जाए वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है

देख लो साकेत नगरी है यही स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही

अत्युक्ति अलंकार

यहां किसी वस्तु को बढ़ा चढ़ाकर किया गया वर्ण झूठा प्रतीत हो वहां अत्युक्ति अलंकार होता है

लखन सको वचन जब बोले डगमगाने मगज डोले

अपह्नुति अलंकार जहां सत्य बात का निषेध कर मिथ्या वस्तु का आरोप किया जाए

सावन की अंधी रजनी वारिद मिस यू टी आई

दृष्टांत अलंकार

जहां पहले कोई बात कहकर उस से मिलती-जुलती बात द्वारा दृष्टांत दिया जाए लेकिन समानता किसी बात द्वारा प्रकट ना हो वहां दृष्टांत अलंकार होता है

उदाहरण अलंकार

जहां किसी बात के समर्थन में उदाहरण किसी वाचक शब्द के साथ दिया जाए

जैसे जैसे जैसे शब्दों का प्रयोग उदाहरण अलंकार में ज्यादा देखने को मिलता है

यथा संख्या व्याकरण अलंकार

जब कुछ पदार्थों का उल्लेख करके उसी क्रम से उससे संबंधित पदार्थों कार्य या गुणों का वर्णन हो तो यथा संख्या क्रम अलंकार होता है

उल्लेख अलंकार

जब किसी वस्तु का अनेक प्रकार से वर्णन किया जाए तब उल्लेख अलंकार होता है

परिकर अलंकार

जब विशेष के साथ किसी विशेषण का अभिप्राय प्रयोग होता परिकर अलंकार होता है

संदेह अलंकार

जहां किसी वस्तु को देखकर सन्न से बना रहे निश्चय ना हो वहां संदेह अलंकार होता है

भ्रांतिमान या भ्रम अलंकार

जहां क्षमता के कारण किसी वस्तु में अन्य वस्तु का भ्रम हो जाए

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